, बदल रहा है गाँव

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नव युग में नव तरह से, बदल रहा है गाँव।
आधुनिक चेतना हुई, रंग-रूप पहनाव ।। १

टावर चिमनी बन रहे , खोया पीपल छाँव।
सब जन मिलते थे जहाँ, रहा नहीं वह ठाँव।। २

बचा नहीं छप्पर कहीं , गौरैया का ठौर।
हरियाली सब मिट रही, हुआ मशीनी दौर।। ३

चैता, कजरी, फागुआ, सबके सब खामोश।
युवा- वर्ग में अब नहीं, पहले जैसा जोश। ४

बिजली सड़कें आ गई, मोबाइल औ’ नेट।
खेत गया किसान का ,पूंजी पति की भेट ।। ५

सुख-सुविधाएं बढ़ रहीं , बदला कृषि आधार।
नई योजना नाम पर, जेब भरे सरकार।। ६

कुटिल स्वार्थ के चक्र में, रहा नहीं गोपाल।
घर-घर टीवी चल रहें, सूनी है चौपाल।। ७

फसे सियासी दाँव में, रिश्ते- नाते प्यार।
रहे नहीं अब गाँव में, वे संस्कार दुलार।। ८

जहर घुला है खेत में, सूख रहें हैं ताल।
नित कर में डूबा हुआ, है किसान बेहाल।। ९

नित विकास के नाम पर, ये कैसा बदलाव।
कृषक जनों में बढ़ रहा,हर दिन एक तनाव।। १ ०
🌹 🌹 🌹 🌹 –लक्ष्मी सिंह 💓 ☺

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